चिपको आंदोलन
वृक्ष कटान के विरुद्ध पर्वतीय महिलाओं का अहिंसक वन-संरक्षण आंदोलन।
विस्तार से
1973-74 में चमोली के रैणी गाँव से उभरा चिपको आंदोलन वृक्ष कटान के विरुद्ध अहिंसक प्रतिरोध का प्रतीक बना, जिसमें गौरा देवी के नेतृत्व में महिला मंगल दल ने पेड़ों से चिपककर ठेकेदारों को रोका। वैचारिक रूप से यह 1730 के खेजड़ली बलिदान से जुड़ता है। आंदोलन की दो धाराएँ रहीं — सुंदरलाल बहुगुणा का शुद्ध संरक्षणवाद और चंडी प्रसाद भट्ट का स्थानीय रोज़गार-केंद्रित दृष्टिकोण। परिणामस्वरूप 1980 में हिमालयी वनों की व्यावसायिक कटाई पर रोक लगी।
मुख्य तथ्य
| वर्ष | 1973-74 |
| स्थान | रैणी गाँव, चमोली |
| नेतृत्व | गौरा देवी |
परीक्षा-दृष्टि
- वृक्ष कटान के विरुद्ध अहिंसक वन-आंदोलन — वैश्विक पर्यावरणीय प्रेरणा
और गहराई से
- 1730 खेजड़ली (राजस्थान) की परंपरा से वैचारिक जुड़ाव
- सुंदरलाल बहुगुणा व चंडी प्रसाद भट्ट — दो अलग धाराएँ (संरक्षण बनाम रोज़गार)
- परिणामस्वरूप 1980 में हिमालयी वनों की व्यावसायिक कटाई पर रोक