उत्तराखंड की लोक-संस्कृति — चित्रकला, लोकगीत व नृत्य
गढ़वाल शैली चित्रकला, ऐपण जैसी लोक-चित्रकला, जागर व झोड़ा जैसे लोकगीत तथा छोलिया व पांडव नृत्य उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान हैं। दोनों परीक्षाओं में यह खंड सर्वाधिक अंक देता है।
गढ़वाल शैली चित्रकला
- 16वीं–19वीं शताब्दी तक प्रचलित; यह पहाड़ी शैली की एक शाखा है जो गढ़वाल नरेशों के संरक्षण में विकसित हुई।
- आरंभ: 1658 ई. में राजा पृथ्वीपति शाह के काल में मुगल शहज़ादा सुलेमान शिकोह दो चित्रकारों (श्यामदास व उसका पुत्र हरिदास) के साथ गढ़वाल आया और उन्हें यहीं छोड़ गया। हरिदास का पुत्र हीरालाल इस शैली का प्रवर्तक माना जाता है।
- मोलाराम: मंगतराम के पुत्र मोलाराम तोमर (1743–1833 ई.) इस शैली के सर्वश्रेष्ठ चित्रकार; प्रदीप शाह, ललित शाह, जयकृत शाह व प्रद्युम्न शाह के संरक्षण में श्रीनगर में कार्य किया। वे कवि व लेखक भी थे — 'गढ़राज-वंश काव्य', 'गढ़गीता-संग्राम'।
- प्रमुख चित्र — चंद्रमुखी, मयंकमुखी, उत्कंठिता नायिका, दंपति (प्रद्युम्न शाह व रानी), राधाकृष्ण मिलन, हिंडोला, मस्तानी। बैरिस्टर मुकुंदीलाल ने मोलाराम के चित्रों को विश्व के सामने लाया; 1803 के भूकंप में श्रीनगर का चित्र-कोष बड़े पैमाने पर नष्ट हो गया।
लोक-चित्रकला — ऐपण व अन्य
- ऐपण: शुभ अवसरों पर देहरी व आँगन पर बिस्वार (चावल का घोल) व गेरू से बनाई जाती है — सूर्य, चंद्र, स्वस्तिक, शंख, कमल व ज्यामितीय आकृतियाँ। वर्ष 2021-22 में इसे GI टैग मिला।
- अन्य रूप — ज्यूंति मातृका (देवी-देवताओं के चित्र), थापा, नाट/डिपुक (रसोई की दीवार पर कुलदेवता), वसुधारा, प्रकीर्ण, तथा दीपावली पर 'पैल' यानी लक्ष्मी के पद-चिह्न।
लोकगीत
- जागर: स्थानीय देवताओं, भूत-प्रेत तथा ऐतिहासिक नायकों से संबंधित आख्यान-गीत; गायक 'जगरिया' कहलाता है। नरसिंह, भैरव, गोलू, गंगनाथ की कथाएँ इसमें आती हैं।
- झोड़ा — कुमाऊँ का समूह-नृत्य गीत, माघ में, मुख्य गायक बीच में हुड़का बजाता है। चांचरी (भोनी) उत्तरायणी पर; न्योली व भगनौल कुमाऊँ के भावप्रधान गीत; बाजूबंद रवाईं-जौनपुर का प्रेम-संवाद गीत।
- खुदेड़ — ससुराल में मायके की याद में गाया जाने वाला गढ़वाली गीत; चौंफुला — प्रेम व सौंदर्य का समूह गीत; बारहमासा — वर्ष के बारह महीनों का वर्णन; पवाड़ा (गढ़वाल) व भड़ौ (कुमाऊँ) — वीर-गाथाएँ।
लोकनृत्य
- छोलिया — कुमाऊँ का प्रसिद्ध तलवार-ढाल युद्ध नृत्य, विवाह व धार्मिक जुलूसों में। पौणा — भोटिया जनजाति का समरूप नृत्य। सरौं — गढ़वाल का ढोल-दमाऊ पर तलवार नृत्य।
- पांडव नृत्य — गढ़वाल में नवरात्रि के नौ दिन, चक्रव्यूह व कमलव्यूह सहित लगभग 20 लोकनाट्य। हारुल — जौनसारी नृत्य जिसमें 'रणतूला' वाद्य अनिवार्य। लंगवीर — बाँस के शीर्ष पर संतुलन का करतबी नृत्य।
लोकवाद्य
- चार वर्ग — तत/तंत्र (सारंगी, एकतारा), सुषिर (तुरही, रणसिंघा, नागफनी, मशकबीन, अलगोजा), अवनद्ध (ढोल, दमाऊ, हुड़का, नगाड़ा, डौंर), घन (घंटा, थाली, मंजीरा, विणई)।
- ढोल: 2015 में राज्य वाद्य घोषित। विणई दाँतों में दबाकर बजाया जाने वाला लघु धातु वाद्य है जो विलुप्ति के कगार पर है।
रंगमंच व सिनेमा
- 'जग्वाल' (1983) गढ़वाल की पहली फ़िल्म; 'मेघा आ' पहली कुमाऊँनी फ़िल्म; 'घरजवैं' (1986, विशेश्वर दत्त नौटियाल) दिल्ली में 29 सप्ताह चली। पौड़ी की 125 वर्ष पुरानी रामलीला 2008 में यूनेस्को सूची में शामिल हुई।
विगत वर्ष प्रश्न
गढ़वाल चित्रशैली का सर्वश्रेष्ठ चित्रकार कौन माना जाता है? (प्रीलिम्स शैली)
अभ्यास प्रश्न
1. ऐपण लोककला को GI टैग किस वर्ष प्रदान किया गया?
- 2021-22
- 2016-17
- 2018-19
- 2023-24
उत्तर: 2021-22
कुमाऊँनी लोककला ऐपण को 2021-22 में भौगोलिक संकेतक टैग मिला।
2. सुलेमान शिकोह किस गढ़वाल नरेश के समय दो चित्रकारों के साथ गढ़वाल आया?
- पृथ्वीपति शाह
- फतेहशाह
- मानशाह
- अजयपाल
उत्तर: पृथ्वीपति शाह
1658 ई. में पृथ्वीपति शाह के शासनकाल में — यही गढ़वाल शैली का आरंभ-बिंदु माना जाता है।
3. 'जगरिया' किससे संबंधित है?
- जागर गायन
- छोलिया नृत्य
- ऐपण चित्रकला
- रणसिंघा वादन
उत्तर: जागर गायन
जागर गाने वाले गायक को जगरिया कहा जाता है।
4. उत्तराखंड का राज्य वाद्य कौन-सा है तथा कब घोषित हुआ?
- ढोल — 2015
- हुड़का — 2011
- दमाऊ — 2016
- रणसिंघा — 2013
उत्तर: ढोल — 2015
ढोल को 2015 में राज्य वाद्य घोषित किया गया।
5. गढ़वाल की पहली फ़िल्म कौन-सी थी?
- जग्वाल
- घरजवैं
- मेघा आ
- तेरी सौं
उत्तर: जग्वाल
'जग्वाल' (1983) गढ़वाल की पहली फ़िल्म; 'मेघा आ' पहली कुमाऊँनी फ़िल्म है।
6. पौड़ी की रामलीला को यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में कब सम्मिलित किया गया?
- 2008
- 2001
- 2013
- 2016
उत्तर: 2008
पौड़ी की लगभग 125 वर्ष पुरानी रामलीला 2008 में सम्मिलित हुई।
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