प्राचीन उत्तराखंड — स्रोत, कुणिंद व कार्तृपुर
उत्तराखंड का प्राचीन इतिहास तीन चरणों में पढ़ा जाता है — प्रागैतिहासिक (पत्थर के औज़ार, शैलाश्रय), आद्य-ऐतिहासिक (पुराण-महाभारत) और ऐतिहासिक (अभिलेख, सिक्के, ताम्रपत्र)। कुणिंद यहाँ के पहले प्रमाणित सिक्का-जारीकर्ता शासक थे।
प्रागैतिहासिक साक्ष्य
- पुरापाषाण: निम्न पुरापाषाण का मुख्य औज़ार हस्तकुठार — कालसी (यमुना तट), अलकनंदा घाटी (श्रीनगर), खुटानी नाला (अल्मोड़ा), रामगंगा घाटी से साक्ष्य।
- मध्य पुरापाषाण के फलक व खुरचनी श्रीनगर के आसपास मिले; उच्च पुरापाषाण के औज़ार राज्य में अब तक नहीं मिले — यह अंतर परीक्षा में पूछा जाता है।
शैलचित्र स्थल
- लखुउड़्यार: अल्मोड़ा के बाड़ेछीना गाँव में सुयाल नदी के तट पर — समूह में नृत्य करते मानव तथा पशु, रंगों से अलंकृत। राज्य का सर्वाधिक प्रसिद्ध शैलाश्रय।
- ग्वारख्या गुफा (चमोली) के पशु-चित्र लखुउड़्यार से भी अधिक चमकीले; किमनी गाँव (चमोली) में हल्के सफ़ेद रंग के अस्त्र व पशु; ल्वेथाप (अल्मोड़ा) में हाथ पकड़कर नाचते व शिकार करते मानव; हुडली (उत्तरकाशी) में नीले रंग का प्रयोग।
आद्य-ऐतिहासिक व पौराणिक संदर्भ
- ऋग्वेद व बौद्ध साहित्य में इस क्षेत्र हेतु 'हिमवंत'; वैदिक काल में 'हिमवत', महाभारत में 'उत्तरकुरु', पुराणों में 'केदारखंड' (गढ़वाल) व 'मानसखंड' (कुमाऊँ) — नंदा देवी शिखर दोनों की विभाजक रेखा।
- वनपर्व: पुलिंद (कुणिंद) राजा सुबाहु ने सतलुज से अलकनंदा तक शासन किया, राजधानी श्रीनगर; उसके बाद राजा विराट, राजधानी विराटगढ़ी (जौनसार के निकट) — अभिमन्यु का विवाह विराट की पुत्री उत्तरा से हुआ।
- कण्वाश्रम (मालिनी नदी तट, वर्तमान चौकाघाट) — सम्राट भरत का जन्मस्थल तथा कालिदास की 'अभिज्ञानशाकुंतलम्' की रचना-भूमि। बद्रिकाश्रम के साथ यह प्राचीन शिक्षा-केंद्र था।
कुणिंद व यौधेय
- कुणिंद राज्य लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू. से — यमुना-सतलुज व अलकनंदा के बीच। इनके सिक्कों पर ब्राह्मी व खरोष्ठी दोनों लिपियाँ मिलती हैं, जो व्यापारिक विस्तार का संकेत है।
- यौधेय शासकों के सिक्के जौनसार-बावर (देहरादून) व कालंदाडांडा (पौड़ी) से मिले; यौधेयों ने कुषाणों को पराजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- जगतग्राम: देहरादून का 'बाड़वाला जगतग्राम अश्वमेध यूप' (तीसरी शताब्दी ई.) राजा शीलवर्मन द्वारा — कुछ विद्वान उसे कुणिंद, कुछ यौधेय मानते हैं।
कार्तृपुर व परवर्ती वंश
- परवर्ती कुणिंदों ने कार्तृपुर राज्य स्थापित किया, जिसमें गढ़वाल, हिमाचल व रुहेलखंड का उत्तरी भाग सम्मिलित था। समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में कार्तृपुर को गुप्त साम्राज्य की उत्तरी सीमा का करद राज्य बताया गया है — यह अत्यंत उच्च-आवृत्ति तथ्य है।
- लखामंडल का खंडित अभिलेख 'छगलेश वंश' का है, जिसमें जयदास, गुहेश, अचल, छगलेशदास, रुद्रदास, केतु आदि सात राजाओं के नाम हैं। राजकुमारी ईश्वरा के लखामंडल अभिलेख से सिंहपुर के यादव वंश की जानकारी मिलती है, जिसका संस्थापक सेनावर्मन था।
विगत वर्ष प्रश्न
समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में उत्तराखंड का कौन-सा राज्य करद राज्य के रूप में उल्लिखित है? (प्रीलिम्स शैली)
अभ्यास प्रश्न
1. लखुउड़्यार शैलाश्रय किस नदी के तट पर स्थित है?
- सुयाल
- कोसी
- गोमती
- रामगंगा
उत्तर: सुयाल
यह अल्मोड़ा के बाड़ेछीना गाँव में सुयाल नदी के तट पर है।
2. कार्तृपुर राज्य का उल्लेख किस अभिलेख में मिलता है?
- प्रयाग प्रशस्ति
- एहोल अभिलेख
- जूनागढ़ अभिलेख
- हाथीगुम्फा अभिलेख
उत्तर: प्रयाग प्रशस्ति
समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में इसे उत्तरी सीमा का करद राज्य बताया गया है।
3. जगतग्राम अश्वमेध यूप का निर्माता कौन माना जाता है?
- शीलवर्मन
- सेनावर्मन
- सुबाहु
- छगलेशदास
उत्तर: शीलवर्मन
देहरादून स्थित यह तीसरी शताब्दी ई. का यूप राजा शीलवर्मन से जोड़ा जाता है।
4. पुराणों में कुमाऊँ क्षेत्र के लिए कौन-सा नाम प्रयुक्त हुआ है?
- मानसखंड
- केदारखंड
- उत्तरकुरु
- हिमवत
उत्तर: मानसखंड
केदारखंड गढ़वाल के लिए तथा मानसखंड कुमाऊँ के लिए; नंदा देवी दोनों की विभाजक रेखा है।
5. कण्वाश्रम किस नदी के तट पर स्थित माना जाता है?
- मालिनी
- सुयाल
- पिंडर
- टोंस
उत्तर: मालिनी
मालिनी नदी तट पर, वर्तमान चौकाघाट — सम्राट भरत का जन्मस्थल।
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