लोकोक्तियाँ — औखाण व पखाणा
कुमाऊँनी में लोकोक्ति को 'औखाण' (आख्यान) या 'किस्स' तथा गढ़वाली में 'पखाणा' (उपाख्यान) कहते हैं। ये अनाम लोक-रचनाएँ हैं, जिनमें डॉ. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल के शब्दों में 'गागर में सागर' भरा होता है।
स्वरूप व वर्गीकरण
- औखाण/पखाणा दो रूपों में मिलते हैं — (क) किसी स्थान-विशेष में प्रचलित, तथा (ख) संपूर्ण पर्वतीय क्षेत्र में प्रचलित। इनका जन्म प्रायः किसी घटना-विशेष से होता है और ये ग्राम-जीवन के अनुभव पर आधारित होती हैं।
- गढ़वाली पखाणा तुकांत तथा अतुकांत — दोनों प्रकार के होते हैं। प्रयोजन चार माने गए हैं: उपहास या आलोचना, कोसने का भाव, प्रामाणिकता की परख, तथा किसी निर्दिष्ट परिणाम की ओर संकेत।
- पिथौरागढ़ की मुन्स्यारी तहसील 1960 से पूर्व 'जोहार' परगना कहलाती थी; यहाँ के शौका समाज पर कुमाऊँनी संस्कृति की स्पष्ट छाप है, इसलिए जोहार व कुमाऊँ की लोकोक्तियाँ लगभग समान हैं — अंतर केवल उच्चारण का है।
कुमाऊँनी औखाण — चयनित
- 'अकलक उमरक भेंट न हनू' — बुद्धि और आयु साथ-साथ नहीं आतीं; समझ अनुभव के बाद आती है।
- 'उज्याड़क ल्ह्यालि बाड़ घालि, बाड़लै उज्याड़ खै' — फसल की रक्षा हेतु घेरा बनाया, पर घेरा ही फसल खा गया; अर्थात् रक्षक ही भक्षक।
- 'अन्याला चोट कन्याला' — अंधे के हाथ बटेर लगना, अर्थात् संयोगवश सफलता।
- 'गरीबक बात बूस जस उड़ँछ' — गरीब की बात भूसे की तरह उड़ जाती है; निर्धन के कथन को महत्व न दिया जाना।
- 'अफसरक आगि बटि, ध्वाड़ाक पाछि बटि नि जान' — अधिकारी के आगे और घोड़े के पीछे नहीं चलना चाहिए।
गढ़वाली पखाणा — चयनित
- 'बरसो मंगसीर, ग्यूँ जौ स्थीर' — मार्गशीर्ष की वर्षा गेहूँ व जौ की फसल के लिए लाभकारी है; कृषि-पंचांग का सूत्र।
- 'अफू चलदन रीता, हैका पढ़ौंदन गीता' — स्वयं ज्ञान न होने पर भी दूसरों को ज्ञान बाँटना।
- 'ध्वीड़ थै चाँठु प्यारो' — सभी को अपना घर (देश) प्यारा होता है।
- 'कभि तैला धाम, कभि सीला धाम' — कभी सुख, कभी दुख; समय एक-सा नहीं रहता।
- 'पढ़ायो लिखायो जाट, सोला दूनी आठ' — मंदबुद्धि को कितना भी सिखाओ, वह ग्रहण नहीं कर पाता।
इतिहास-वाहक लोकोक्तियाँ
- 'गढ़वाल कटक त कुमौं सटक, कुमौं कटक त गढ़वाल सटक' — चंद व पँवार राजाओं के निरंतर युद्धों में प्रजा एक ओर से दूसरी ओर पलायन करती थी।
- 'एक सिंह रण, बण, एक सिंह गाय का, एक सिंह माधोसिंह, और सिंह काय का' — टिहरी के पँवार शासक महिपतिशाह (1625-1633) के सेनानायक माधोसिंह भंडारी की वीरता पर प्रचलित।
- 'गोरख्याणी मचीं छ' — 1803 से 1815 तक गढ़वाल पर गोरखा शासन के अत्याचारों की स्मृति; 'नादिर सै मचीं छ' नादिरशाह के अत्याचारों की।
- 'अंगरेजू राज, न गत्यूं कपड़ा न पेटौ नाज' — अंग्रेज़ी शासन में न तन ढकने को कपड़ा मिलता था, न पेट भरने को अनाज; 'धोत्या कमाऊन टोपल्या खाउन' भी इसी भाव की है।
विगत वर्ष प्रश्न
कुमाऊँनी बोली में लोकोक्ति को किस नाम से जाना जाता है? (UKSSSC शैली)
अभ्यास प्रश्न
1. गढ़वाली में लोकोक्ति को क्या कहते हैं?
- पखाणा
- औखाण
- किस्स
- जागर
उत्तर: पखाणा
गढ़वाली में 'पखाणा' तथा कुमाऊँनी में 'औखाण' या 'किस्स'।
2. 'गोरख्याणी मचीं छ' लोकोक्ति किस काल की स्मृति है?
- 1803–1815 गोरखा शासन
- 1815–1947 ब्रिटिश शासन
- चंद-पँवार युद्ध
- नादिरशाह का आक्रमण
उत्तर: 1803–1815 गोरखा शासन
1803 से 1815 तक गढ़वाल पर गोरखा शासन के अत्याचारों की स्मृति।
3. 'एक सिंह माधोसिंह' लोकोक्ति किस सेनानायक से संबंधित है?
- माधोसिंह भंडारी
- पुरुषोत्तम पंत
- गबर सिंह नेगी
- नीलू कठायत
उत्तर: माधोसिंह भंडारी
टिहरी के पँवार शासक महिपतिशाह (1625-1633) के सेनानायक माधोसिंह भंडारी।
4. मुन्स्यारी तहसील 1960 से पूर्व किस परगने के नाम से जानी जाती थी?
- जोहार
- दानपुर
- गंगोली
- सोर
उत्तर: जोहार
पिथौरागढ़ की मुन्स्यारी तहसील 1960 से पूर्व जोहार परगना कहलाती थी।
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